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Indian Supreme court/Indian Judiciary

Indian Supreme Court
Indian Judiciary (Review and Services)


Indian Supreme court/Indian Judiciary



भारत मे न्यायपालिका के सर्वोच्च स्तर पर सर्वोच्च न्यायालय एवं उच्च न्यायालयो के अधिन जिला न्यायालय व अधीनस्थ न्यायालय हैं ।

भारतीय सर्वोच्च न्यायालय (Indian supreme court) :-


  • संविधान के अनुच्छेद 124 से 147 में केन्द्रीय न्यायपालिका से सम्बंधित प्रावधान हैं।
  • Indian Supreme court का गठन संविधान के अनुच्छेद 124 के तहत किया गया हैं ।
  • भारत का सर्वोच्च न्यायालय नई दिल्ली मे स्थित हैं ।
  • भारत के सर्वोच्च न्यायालय का उद्घाटन 28 जनवरी,1950 को किया गया था ।
  • स्वतंत्रता पश्चात सर्वोच्च न्यायालय के प्रथम मुख्य न्यायाधीश जस्टिस हीरालाल जे.कानिया थे ।
  • Indian Supreme court की प्रथम महिला न्यायाधीश जस्टिस फातिमा बीबी 1987 मे बनी थी ।
  • सर्वोच्च न्यायालय मे न्यायाधीशों की संख्या मे वृद्धि या कमी करने की शक्ति संसद में निहित होती हैं ।
  • सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य व अन्य न्यायाधीशो की नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति द्वारा की जाती हैं ।
  • सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को राष्ट्रपति द्वारा शपथ दिलवाई जाती हैं ।

Indian Supreme court के न्यायाधीश के लिये योग्यताएं :- 


  • वह भारत का नागरिक हो ।
  • किसी उच्च न्यायालय मे कम से कम 5 वर्षो तक न्यायाधीश रहा हो ।
  • कम से कम 10 वर्षों तक किसी उच्च न्यायालय मे अधिवक्ता रहा हो ।
  • राष्ट्रपति की राय मे पारंगत विधिवेत्ता हो ।

Indian Supreme court के न्यायाधीश का कार्यकाल :-


  • सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश 65 वर्ष की आयु तक अपने पद पर बना रह सकता है,किन्तु वह इससे पूर्व भी अपना त्यागपत्र राष्ट्रपति को दे सकता है ।

Indian Supreme court के न्यायाधीश के वेतन - भत्ते :-


  • Indian Supreme court के न्यायाधीश के वेतन भत्ते समय-समय पर संसद द्वारा निर्धारित किये जाते हैं और ये वेतन भत्ते भारत की संचित निधि पर भारित होते है ।
  • अवकाश ग्रहण के पश्चात सर्वोच्च न्यायालय का कोई भी न्यायाधीश भारत के किसी भी न्यायालय में वकालत या अभिवाचन नहीं कर सकता, न ही न्यायाधीश बन सकता हैं, परन्तु उसे भारत के मुख्य न्यायाधीश द्वारा सर्वोच्च न्यायालय या अन्य न्यायालयों मे तदर्भ न्यायाधीश के रूप मे नियुक्त किया जा सकता हैं ।

Indian Supreme court की शक्तियाँ एवं क्षेत्राधिकार :-


1. प्रारम्भिक क्षेत्राधिकार :- 

  • सर्वोच्च न्यायालय का प्रारंभिक क्षेत्राधिकार परिसंघीय प्रकृति का है । 
  • यह केंद्र सरकार व राज्यों के मध्य विवादों का निर्णय करने का अधिकार रखता हैं ।

2. न्यायादेश क्षेत्राधिकार :- 

  • संविधान के अनुच्छेद 22 मे सर्वोच्च न्यायालय को नागरिको के मूल अधिकारो के रक्षक के रूप में स्थापित किया गया है ।
  • सर्वोच्च न्यायालय को अधिकार प्राप्त है कि वह बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, उत्प्रेषण,प्रतिषेध एवं अधिकार प्रेच्छा पर आदेश जारी कर नागरिकों के मूल अधिकारों की रक्षा करें ।

3. अपीलीय क्षेत्राधिकार :- 

  • उच्चतम न्यायालय न केवल भारत के संघीय न्यायालय के उतराधिकारी की तरह है, बल्कि यह अपील का अंतिम न्यायालय भी हैं ।
  • उच्चतम न्यायालय निचली अदालतों के फैसलों के खिलाफ सुनवाई करता है ।

4. सलाहकार क्षेत्राधिकार :- 

  • अनुच्छेद 143 के अनुसार राष्ट्रपति दो श्रेणियों के मामलों मे उच्चतम न्यायालय से सलाह लेने का अधिकार रखता है -
  • प्रथम - सार्वजनिक महत्व के किसी मामले पर विधिक प्रश्न उठने पर ।
  • द्वितीय - किसी पूर्व संवैधानिक संधि व समझौतों आदि पर विवाद उत्पन्न होने पर ।
  • पहले मामले पर उच्चतम न्यायालय अपना मत दे भी सकता हैं या इन्कार भी कर सकता हैं, परन्तु दूसरे मामले पर उच्चतम न्यायालय द्वारा राष्ट्रपति को अपना मत देना अनिवार्य हैं, लेकिन राष्ट्रपति बाध्य नही हैं कि वह इस सलाह को माने ।

5. पूनरीक्षात्मक क्षेत्राधिकार :-

  • सर्वोच्च न्यायालय को अनुच्छेद 137 के तहत अपने किसी निर्णय या आदेश की पुनरिक्षा करने का अधिकार हैं ।
  • Indian Supreme court द्वारा लिये गये निर्णय या आदेश भारत के सभी न्यायालयो पर बाध्यकारी होते हैं, किन्तु वे स्वयं सर्वोच्च न्यायालय पर बाध्यकारी नही होते हैं ।

6. न्यायिक समीक्षा क्षेत्राधिकार :- 

  • उच्चतम न्यायालय मे न्यायिक समीक्षा की शक्ति निहित हैं ।
  • इसके तहत वह केंद्र व राज्य दोनों स्तरों पर विधायी व कार्यकारी आदेशों की जांच कर सकता हैं ।

7. अन्य शक्तियां :-

  • यह राष्ट्रपति व उपराष्ट्रपति के निर्वाचन के सम्बंध मे किसी प्रकार के विवाद का निपटारा करता है ।
  • यह संघ लोकसेवा आयोग के अध्यक्ष एवं सद्स्यों के व्यवहार व आचरण की जाँच करता हैं ।
  • उच्च न्यायालयो मे पड़े मामलों को यह मँगवा सकता हैं और उनका निपटारा कर सकता है ।
  • इसके आदेश सभी न्यायालयो एवं पूरे देश में लागू होते हैं ।
  • इसका देश के सभी न्यायालयो के क्रियाकलापों पर नियंत्रण होता हैं ।

Indian Supreme court के न्यायाधीश को पद से हटाना :-

  • संविधान के अनुच्छेद 124 (4) के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को राष्ट्रपति द्वारा संसद के प्रत्येक सदन द्वारा अपनी कुल सदस्य संख्या के बहुमत व उपस्थिति एवं मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो तिहाई समर्थन से पारित प्रस्ताव के आधार पर हटा सकता हैं ।
  • ऐसा प्रस्ताव संसद के किसी भी सदन मे पेश किया जा सकता हैं, बशर्तें -
  • अगर लोकसभा मे प्रस्तुत किया जाये तो, उसके कम से कम 100 सदस्यों द्वारा हस्ताक्षर किया जाना अनिवार्य हैं तथा राज्य सभा मे प्रस्तुत करने पर उसके कम से कम 50 सदस्यों के हस्ताक्षर अनिवार्य हैं ।
  • ऐसा प्रस्ताव सम्बन्धित न्यायाधीश को कम से कम 14 दिन की पूर्व सूचना देने के बाद ही पेश किया जा सकता हैं ।
  • यदि प्रस्ताव संसद मे पारित हो गया हो, तब राष्ट्रपति के हस्ताक्षर होते ही न्यायाधीश अपने पद से हटा हुआ मान लिया जाता हैं ।

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